मेरी डायरी (पुरानी)के 12 पन्ने PAGES OF MY OLD DIARY

my diary

मेरी डायरी के पन्ने (MY DIARY)

 स्कूल और कालेज़ के शुरुआती दिनों में मुझे प्रतिदिन डायरी लिखने का शौक़ था, लेकिन समय के साथ लिखना पढ़ना कम होता गया और लगभग छूट ही गया। उन दिनों कहानी, कवितायें लिखने का भी शौक़ ख़ूब था बाद के दिनों में सब छूट सा गया और विस्मृत भी हो गया। अचानक कुछ ख़ोजते हुए पुरानी डायरी के कुछ पन्ने मिले जो नब्बे के दशक के थे उनमें मेरी उस समय की कुल 12 छोटी कवितायें मिलीं जो यहाँ पर प्रस्तुत कर रहा हूँ। इन कविताओं को पढ़कर 25-30 साल पुराने दिन याद आ गये कि हम भी कुछ सोच पाते थे। अभी भी बहुत सी डायरियाँ कहीं दबी पड़ी हैं, यदि कभी मिलीं तो ज़रूर प्रस्तुत करूँगा। लेकिन एक बात जो मुझे लगती है तो वो यह कि हमें लिखने की आदत बनानी चाहिये। तो प्रस्तुत हैं मेरी बस यूँ ही लिखी गईं मेरी डायरी (MY DIARY) से 12 कविताएं।

मेरी डायरी/MY DIARY

01
चन्द अल्फ़ाज़
जब तलक तन्हा था मैं, ज़िन्दगी मेरे क़रीब थी
अब तन्हा है ज़िन्दगी, तो मैं भी उससे दूर हूँ

जी रहा था तन्हाइयों में मैं, तो (मौत) तू भी न आ सकी
खुशी जो तनिक मिली मुझे, तुम आ गईं महबूबा बन के

तमन्ना है ग़र जीने की दिल में
तो ऐ दोस्त मौत से मोहब्बत कर ले

तू ज़िन्दगी की हक़ीकत है, लोग तुझसे डरते हैं
ग़र एक बार मिल जाए मुझे, मैं दोस्ती कर लूं

मिलना नहीं चाहती मुझसे, ग़र ख़ुद आकर
पता-ठिकाना ही बता दे, मैं ढूंढ लूंगा तुझे

अब तलक देखा है औरों के साथ तुझे
सोचता हूँ ग़र तू मेरी बाँहों में बाहें डाले तो अच्छा

आख़िर कब तलक जलेगी शम्मा, इस तूफ़ान में
बच न पाई है कोइ गर्दन फंदे में लटकने के बाद ||१९९३में||

मेरी डायरी/MY DIARY

02. पलटो एक बार फिर

अपनी स्मृतियों के पिछले पन्ने

मेरी चाहत पर

मुझको है विश्वास

हम अज़नबी नहीं होंगे ||०१/०१/१९९३||

मेरी डायरी/MY DIARY

03

कल्पना  लोक में विचारना,
आदत है,
उसकी
नहीं रोक पाता वह,
ख़ुद को,
दिवा स्वप्नों की दुनिया में जाने से,

हर-पल, हर-क्षण,
वह विचरता है नई दुनिया में
जानता है वह
कि यह सब घातक है,
उसके इंसान बनने में,
फिर भी वह, रोक नहीं पाता
ख़ुद को,
क्योंकि …………||०३/०३/१९९३||

मेरी डायरी/MY DIARY

04.

अधूरी कहानी

मैं

नित नई कहानियां गढ़ता हूँ,

नई नायिकाओं के साथ,

मेरी कहानी में खलनायिकाएं होती हैं,

पुरानी स्मृतियाँ, पुरानी नायिकाएं,

हमेशा ही

किसी रोमांटिक कहानी के,

नायक की तरह

नई नायिका के साथ

सपनों के ताने-बाने बुनता हुआ,

मैं,

अपने पुराने वादों को यादकर

सहम जाता हूँ,

कि कहीं बेवफ़ा न कहाने लगूं,

और

शायद इसीलिए

अपनी कहानी

अधूरी छोड़ देता हूँ

फिर से नई नायिका के चुनाव तक ॥03/03/1993॥

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मेरी डायरी/MY DIARY

05

कितना आसान है,
मेरे लिए
खुशहाल जीवन की कल्पना करना,
दुनिया की तमाम बुलन्दियों को छूकर,
अपने आप को कितना पूर्ण पाता हूँ,
लेकिन
सह नहीं पाता
कल्पना से बाहर के यथार्थ को,
क्योंकि
कल्पना के सिवा कुछ करना नहीं चाहता।
वर्तमान की ज़िम्मेदारियों, ज़रूरतों से
बेख़बर
भावी योजनाओं का मकड़ ज़ाल,
बुनता हुआ
मैं,
अक्सर
भूल जाता हूँ कि,
इस ज़ाल में फंसकर,
तबाह कर सकता हूँ,
अपने वर्तमान को ॥17/03/1993॥

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मेरी डायरी/MY DIARY

06

अस्तित्व

अपनेपन से अलग
खो जाना चाहता है
वह
दुनिया के सुख-दुख में,
अब घृणा होने लगी है उसे,
अपनेपन से,
अक्सर डर जाता है वह
अपना आने वाला कल देखकर
और फिर सोचता है कि
उसने ख़ुद ही तो बर्बाद किया है,
सब कुछ,
सहज ढंग से मिटाया है,
यहाँ तक कि-
ख़ुद अपना अस्तित्व भी ॥17/05/1993॥

मेरी डायरी/MY DIARY

07

शुभ हो,

तेरे जीवन का वर्ष नया,

मेरे सपनों के मेहमां,

हाँ!

कहता हूँ मैं,

तुमको मेहमां ही,

क्योंकि, मेहमानों के ही,

आने से पहले तय होता है जाना भी ॥01/01/1994॥

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मेरी डायरी/MY DIARY
08
आख़िरकार
प्रतिक्षा की घड़ियाँ ख़त्म हुईं,
सहसा घड़ी की तीनों सुइयों ने
आपस में आलिंगनबद्ध हो,
स्वागत किया एक नई तारीख़ के साथ,
नये वर्ष का
दूर दिल को दहला देने वाली,
पटाख़ों की ध्वनि,
और
कल्पना लोक में खोया
अपनी चिर सहचरी, चारपाई पर
काग़ज के चन्द टुकड़ों,
एवं कलमों के साथ,
अपनी स्मृतियों का दिमाग़ी संग्रह,
टटोलता,
रोज़ की तरह,
बिलकुल अकेला मैं.
अचानक
गीत का स्वर कहीं दूर से,
मेरी स्मृतियों की दुनिया को,
और गहराने लगा

“दिल चीज़ क्या, आप मेरी जान लीजिए”,

बेवफ़ा यार की यादें,
और
लगातार पटाख़ों का स्वर.
अपने-अपनों के साथ,
नये वर्ष के आगाज़ की,
खुशी का जश्न मनाते लोगों की,
किलकारियों का शोर।
अपनी स्मृतियों को कुरेदता,
मचलते दिल की धड़कनों की गति को
सामान्य करने का प्रयास करता मैं,
अचानक अनायास ही कागज़-कलम के साथ,
भागने का प्रयास करता हूँ।
अपने भीतर-बाहर,
अपने-आप के बारे में सोचकर,
जी चीख़कर रोने का होता है,
लेकिन नहीं,
डर है कि अगर,
नये वर्ष का आगाज़ मैंने आँसुओं से किया,
तो बीतेगा सारा वर्ष यूँ ही।
पर यही क्या कम है?
अकेला मैं अक्सर होता हूँ,

मगर

परेशान नहीं किया मेरे अकेलेपन ने इतना मुझे,
स्मृतियों में लौटने का प्रयास करता हूँ, डर जाता हूँ,
भविष्य में कुहासा छा जायेगा, मेरे दिल के लहू के,
वाष्पीकरण से क्योंकि,
दिल मेरा जलने लगता है अतीत में लौटने पर,
और मैं भविष्य को मिटाना नहीं चाहता ॥01/01/1994॥

मेरी डायरी

09

प्रवाह

ख़ुद को तन्हा करने की,

कोशिशें,

जब लगातार नाक़ाम होती हैं,

तेज़ बहाव में,

नदी की धारा का प्रतिरोध कर, पुलिनों पर झलकती,

वृद्धा की नसों सी, पेड़ों की जड़ों पर,

चढ़ने का,

असफल प्रयास करतीं,

मछलियों की तरह,

मैं भी बह जाता हूँ,

ख़यालों के तेज़ प्रवाह ,

के साथ ,

असीम सागर की ओर ॥01/01/1994॥

मेरी डायरी

10

रिक्शावाला

शाम ढलते ही,
लौट आता है,
अपने अधखुले शटर वाले,
अस्थाई मकान में,
उसे नहीं पता,
कब यह मकान भी छोड़ना पड़ जाय।
घर के सामने, ईंटों के तीन टुकड़ों को,
जोड़कर बनाये गए चुल्हे में,
ख़ुद या पत्नी द्वारा जलाई गई आग में,
थके हुए ज़िस्म को सेंकता हुआ, अपनी बीबी के साथ,
दिनभर की कमाई से लाये हुए,
दो सेर आटे की रोटियों,
पाव भर आलू के भुर्ते की,
भूख लिये,
अक्सर बतियाता है,
उन लोगों के बारे में,
जिन्हें वह छोड़ आया है उनके गंतव्य पर,
अपने पसीने के मोल-भाव के साथ।
पसीने की रोटी का सुख,
और फिर,
पत्नी एवं बच्चों के साथ
अधखुले शटर वाले मकान के,
एक कोने में पड़ी,
गुदड़ी मे दुबक कर खो जाता है,
अपनी छोती सी सुखद दुनिया में।
मार्क्स, बुद्ध, गाँधी, राम या रहीम,
इरान, इराक़, कश्मीर, मन्दिर या मस्ज़िद,
कुछ भी नहीं रखते मायने,
बतियाते तक नहीं सुना उसे,
ऊंची इमारतों, वातानुकूलित कमरों के,
सुखों के बारे में,
शायद सोचा ही नहीं,
तारकोल की स्याह सड़कों से,
पृथक दुनिया के बारे में।
कभी नहीं सुना उसे,
तेज़ रफ़्तार दुनिया के तेज़ रफ़्तार वाहनों का,
बखान करते,
उसके लिये तो जैसे,
तीन पहियों के साथ जुड़ी चैन,
और घूमते दो पैडलों मे ही,
जीवन का सारा सुख,
सिमटा हुआ है ॥04/02/1994॥

मेरी डायरी

11

शिकायतनामा

कम-अज़-कम
किया होता विश्वास,
मुझ पर न सही,
मेरी चाहत पर ही सही,
सचमुच न सही, बहलाने के लिए ही सही,
जताया होता अपनापन,
ख़ाबों में ही एक बार,
प्यार से अपना कहा होता,
फिर,
धीरे से कहते तुम,
मैं नही, है कोई और,
तुम्हारे सपनों का हमसफ़र,
सच मानो,
मैं चला जाता,
दूर, इतनी दूर,
जहाँ से सिर्फ़ मैं देख पाता तुम्हें,
खुशियों के आगोश मे,
मनचाहे हमसफ़र के साथ। ॥05/01/1995॥

मेरी डायरी

12

काश….

अक्सर ही टाल दिया तुमने,
हँसकर मेरी बातों को,
मेरी गम्भीरता का,
उड़ाया खुलकर मज़ाक,
समझा आवारापन,
मेरी चाहत पर लगाई,
व्यावसायिकता की तोहमत.
सह गया सब कुछ मैं,
टूटता भी गया शीशे की मानिन्द,
पर,
कभी नहीं ज़ाहिर होने दिया यह सब तुमपर,
क्योंकि मैं नहीं सह सकता,
तुम्हारी हँसी,
अपनी टूटन पर,
काश….
चाह होता देखना,
मेरी आवारा कहाने वाली
उदास किंतु हँसती आँखों में,
तो सिर्फ़ तुम देखी पाते,
अपनी और सिर्फ़ अपनी स्मृतियों की छाया,
अपने दिए घावों का दर्द,
और,
अपनी बेरुख़ी से पनपा,
आवारग़ी का आभास। ॥05/01/1995॥

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